सोमवार, 27 जून 2016

परवरिश

                मैं राह ही देख रही थी कि पौने दस के करीब डोरबेल बजी..... मेरा अनुमान सही था,वो दुर्गा ही थी। मैंने देर से आने का कारण पुछा तो वही रोज की वजह.......माँ-बाप का झगड़ा और गंदी परवरिश से पिसते बच्चें।
                     दुर्गा........ सोलह सत्रह साल की गोरी जवान और खुबसूरत सी लड़की, जो पिछले कुछ दिनों से मेरे घर काम करने आ रही थी। छ: बहन भाईयों में दुर्गा दुसरे नम्बर पर थी,पहले नम्बर पर एक आवारा भाई था जो तकरीबन पूरी तरह से बिगड़ चुका था। तीसरे नम्बर की बहन का नाम शारदा था जो की सातवीं कक्षा में पढ़ती थी, चौथे नम्बर का भाई छठी में था और दो छोटी बहनें जो अभी स्कुल नहीं जाती थी।
           एक बार दुर्गाष्टमी के दिन मैंने उसकी दोनो छोटी बहनों को खाने पर बुलाया था,वो दोनो इतनी सुंदर बच्चियाँ थी कि मैं मंत्र मुग्ध सी हो गयी....... भगवान ने चारों बहनों को रूप रंग देने में कोई कोर कसर ना रखी थी।
 दुर्गा ने दसवीं तक पढ़ाई की थी और अक्सर मुझसे कहती थी कि,
            "दीदी,मुझे आगे पढ़ना है, लेकिन मेरा बाप मुझे बीयर बार में काम करने को बोलता हैं।"
   मैं सकते में आ गयी कि ऐसा भी बाप होता हैं । मैंने उससे कहा कि,
       " अगर तुझे वाकई पढ़ना हैं तो फीस के पैसे मैं देती हूँ।"
                   लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया ।
दुर्गा  मुझे अक्सर अपनी और अपने घर की परिस्थिती बताया करती थी और धीरे धीरे मेरे मन में उसके लिये कुछ जगह बनने लगी,आप इसे सहानुभूति भी कह सकते हैं।उसका बाप पूरा दिन दारू पीता था और रात को चौकीदारी करता था....... वो बिल्कुल अय्याश किस्म का इंसान था जो अपनी पत्नी और बेटियों का भी सौदा कर ले ।उसने बताया कि पहले वह अगरबत्तियाँ बनाने की कम्पनी में काम करती थी,फिर गाँव में एक डॉक्टर की सहायक बनी। उसके अनुसार डॉक्टर के गलत व्यवहार की वजह से उसने वो काम छोड़ दिया।मैंने दुर्गा से कहा कि कभी भी अपने बाप के कहने से बार पर काम नहीं करना, तू दसवीं तक पढ़ी हैं..... कुछ तो कर ही सकती हैं......लेकिन उसने कुछ नहीं कहा और उल्टे मुझ से पूछने लगी,
        "दीदी,ये एड्स क्या होता हैं ?" मुझे ऐसे प्रश्न की उम्मीद नहीं थी सो मैं सकपका गयी और उसे दूसरा काम बता दिया.......... अब मैं उसे परखने लगी थी,मैंने पाया कि उसे सुंदरता का घमंड था और वो भी इसे कमाई का साधन समझती थी,उसकी ईच्छाएँ अन्तहीन थी,लेकिन जैसे जैसे दुर्गा मुझसे खुलती गयी मेरी सहानुभुति सतर्कता में बदलती गयी,उसके माँ-बाप की परवरिश मुझे उसकी आँखों में झलकने लगी।
                                                                 एक दिन दुर्गा की जगह उसकी माँ आई........ लगा जैसे साक्षात अन्नपूर्णा बिल्कुल देवीस्वरूपा । बड़ी सी लाल बिंदी माथे पर झिलमीला रही थी,भगवान ने उसे भी फुर्सत में ही गढ़ा था शायद। छ: बच्चों की माँ तो कही से भी नहीं लगती थी,चेहरे पर लकीरे जरूर थी लेकिन उम्र की नहीं चिन्ता की।उसने कहा कि दुर्गा बीमार है दो तीन दिन नहीं आयेगी।
       मुझे तो खैर काम से मतलब था तो मैंने ज्यादा कुछ पूछा नहीं।दुर्गा की माँ ने काम कम किया और बातें अधिक की। वो बोली,
               " पेट भरने को रोटी का जुगाड़ हो जाये वही बहुत हैं,मैं अकेली छ: बच्चों को कैसे पालू,वो बेवड़ा तो दूसरी औरतों पर कमाई लुटाता हैं,उसका बस चले तो हमे भी बेच खाये।"
       मैं सन्न रह गयी लेकिन बात को आगे बढ़ाया नहीं।दूसरे दिन दुर्गा की माँ भी नहीं आई,शारदा आई।वैसे तो वो बारह साल की बच्ची थी,लेकिन नखरें बिल्कुल छम्मक छल्लों टाईप।मुझे वो बिल्कुल पसंद नहीं आई,मुझे आश्चर्य तो तब हुआ जब मैंने उसके पास मोबाईल देखा....................मेरी आँखों के आगे उसकी माँ की छवि घूम गयी जो कल ही बोल रही थी कि पेट भरने को रोटी का भी जुगाड़ नहीं होता ।
     मैंने उससे पूछा ये मोबाईल कहाँ से लाई तो वो बोली एक पुलिस वाले अंकल हैं जो माँ को बहन मानते है,उन्होने दिलाया।उसकी आँखों में भी वही परवरिश झलक रही थी।
          तीन दिन के बाद दुर्गा आई........ ज्यादा निखरी और ज्यादा खिली हुई,कही से भी नहीं लग रहा था कि वो बीमार थी,मेरे पूछने पर बोली कि पुलिस वाले मामा के साथ लोनावला घुमने गयी थी............।
अगले दिन से वो काम पर नहीं आई,फोन किया तो जवाब मिला कि उसे काम की जरूरत नहीं हैं।
           मैंने नयी बाई रख ली लेकिन रह रहकर दुर्गा दिमाग में आती रही....... एक दिन किसी ने बताया कि दुर्गा के झोपड़े के आस पास रात को पुलिस की गाड़ी आती रहती थी और दो तीन घंटे बाद चली जाती थी......... और....... उस समय दुर्गा के अलावा परिवार के सभी सदस्य खुले आसमान में तारें तकते थे।

सोमवार, 20 जून 2016

हाँ,मैं रजस्वला हूँ

मैं वर्जित हूँ
क्योकि
मैं रजस्वला हूँ
यूँ तो
मै घर की धुरी हूँ
लेकिन 
'उन दिनों' मैं
घर से ही वंचित हूँ
वर्जनाओं 
के ताने बाने से बुने
उन दिनों में 
मैं सहमी सी रहती हूँ
लेकिन
कभी कभी
वर्जनाओं से पार 
जाकर भी देखा हैं मैंने
अचार कभी भी ख़राब नहीं हुआ
यक़ीन मानिये
मैंने हाथ लगाकर देखा हैं
मुझे याद हैं
वो शुरुआत के दिन
जब नासमझी में
मैंने मंदिर में
प्रवेश कर लिया था
यक़ीन मानिये 
भगवान बिल्कुल भी रूष्ट नहीं हुए थे
हाँ, घर के रूष्ट लोगो ने
वर्जनाएँ लाद दी थी मुझ पर
तब से लेकर आज तक
'उन दिनों' वर्जित हूँ मैं
हर जगह
किसने बनाया ये नियम ?
शायद पुरूषवाद ने !
लेकिन 
सुनो पुरूषवाद
ग़र तुम रजस्वला होते
तो क्या वर्जित रहते ? 
क़तई नहीं !
तुम कहते
कि हम पवित्र है
क्योकि हम
प्रत्येक माह
शुद्धीकरण की प्रक्रिया 
से जो गुज़रते हैं 








रविवार, 19 जून 2016

पिता

पिता
सिर्फ पिता होते हैं
एक समय में
एक ही किरदार होते हैं
वे पूरी तरह से
सिर्फ पिता होते हैं
वे पिघल के
बरसते नहीं हैं
बहुत कुछ सहते हैं
लेकिन 
कभी कुछ भी 
कहते नहीं हैं
पिता
सिर्फ पिता होते हैं
उन्हे लोरी नहीं आती
सुलाने को
लेकिन
बातें सार्थक आती हैं
आँखें खोल
दुनियाँ दिखाने को
माँ मारती हैं
धरती को
जब ठोकर खाकर गिर जाते हैं
लेकिन 
पिता....
ठोकर खाकर सँभलना सीखाते हैं
वे मौन रहते हैं
हमारे सपने सजाते हैं
आँखों में अपनी
भविष्य हमारा 
बुनते हैं
पिता 
सिर्फ पिता होते हैं
जीवन भर
एक ही किरदार
में होते हैं
लेकिन 
जब हाथ छोड़ 
चली जाती हैं 'माँ'
तो 
ये पिता
माँ भी बन जाते हैं 

सोमवार, 13 जून 2016

कौसानी

घुमावदार रास्तें
स्वागत करते लम्बें पेड़
अपनी ओर बुलाते पहाड़
लगातार बोलते झिंगुर
चहचहाते पक्षी
क्या कोई इसका सानी हैं
जी हाँ, शहर ये कौसानी है 
दूर से छुप छुप लुभाता हिम
गरजते बादल
कड़कती बिजली 
जम के बरसने को आतुर 
मौसम ये रोमानी हैं 
जी हाँ, शहर ये कौसानी हैं
शांत,नीरव, मनभावन
हवा में कैसा जादू हैं
भीगे मन,भीगे तन
पत्ते पत्ते में संगीत हैं
सुबह है सुंदर
तो रैना भी दीवानी हैं
जी हाँ, शहर ये कौसानी हैं
अलसुबह की किरणें
हिम पे जा गिरती
भुला देती सुध बुध
लेकिन 
उड़ते आवारा ये बादल
ढ़क देते इसकी सुनहरी छँटा 
ये बात कितनी बेमानी हैं
जी हाँ, शहर ये कौसानी हैं।



रविवार, 5 जून 2016

चिढ़ते रहो

तुम चिढ़ते हो
मुझसे 
या 
मेरे वजूद से.....नहीं पता
लेकिन
जब भी मैं 
कुछ नया करती हूँ
तुम्हारा अहम
चोट खाता हैं
मैंने महसूस किया हैं
तुम्हारी जलन को
तुम्हारी प्रतिद्वन्दता को
तुम्हारी बेवजह की तर्कशक्ति को
हाँ.....
ये सच हैं कि तुम कहते कुछ नहीं
लेकिन 
घुमा फिरा कर आग ही तो उगलते हो
जानते हो तुम ?
उस आग में 
झुलस जाती हूँ मैं
और फिर...
अपने फंफोलों को सहलाते सहलाते
मैं फिर कुछ रच देती हूँ
और पुन: 
तुम जैसे लोग 
मेरी अच्छी 'क़िस्मत' पर
बधाईयाँ देने पहुँच जाते हैं
और मैं.....
मुस्कुरा देती हूँ.....
उन फंफोलों को देखकर 
जो शायद तुमने नहीं देखे
मैंने सहयोग नहीं माँगा
संदेह नहीं
तुमने कभी दिया भी नहीं 
मैंने हमेशा तुम्हारा हौसला बढ़ाया
लेकिन....
तुमने मुझे कभी सराहा नहीं
और 
यही सराहने की चाहत
मेरे वजूद को ठोस करती गयी
इसलिये.....
मुझे 
मन ही मन 
ना चाहने वालों
शुक्रिया तुम सभी का
क्योकि 
ये तुम्हारी चिढ़ ही हैं
जो रंग ला रही हैं 
#चिढ़ते_रहो