शनिवार, 3 मई 2014

माँ - एक संक्षिप्त जीवन परिचय

"ऐ अँधेरे देख ले मुँह तेरा काला हो गया ,माँ ने आँखे खोल दी घर में उजाला हो गया "
मुनव्वर राणा की ये पंक्तियाँ कितनी सच है । लेकिन जिस घर में माँ की मौजूदगी नहीं हो वहाँ तो अंधेरा ही अंधेरा है,इस अंधेरे में माँ की यादें ही एक टिमटिमाती सी लौ है,जिसके सहारे जिन्दगी को जिया जा सकता है। मेरी माँ की याद में........एक संक्षिप्त जीवन परिचय
मेरी माँ......एक धार्मिक,कर्मठ,निडर,आत्मविश्वासी और सच्चा सादा व्यक्तित्व !
छः भाई बहनों में मम्मी चौथे नम्बर पर थी। मेरा ननिहाल सदैव से ही एक सुखी सम्पन्न परिवार रहा है।मेरी नानी बेहद धार्मिक और अनुशासनप्रिय महिला थी।नानाजी मेहनती और ईमानदार तो थे ही ,अपने अच्छे कर्मों की वजह से बहुत मान और लोकप्रियता भी पाते थे। आज भी उनकी लोकप्रियता बरक़रार है। मम्मी ने शायद नानी और नानाजी दोनो के गुणों को ही अपने अंदर समाहित किया था......िबल्कुल उनके जैसे....बेहद धार्मिक,अनुशासनप्रिय,ईमानदार,स्वाभिमानी,मितव्ययी,पढ़ने की शौक़ीन,नयी चीज़ें जानने को उत्सुक,सदैव सत्यवादी और बिल्कुल नानाजी की ही तरह साधारण पहनावा। भाई बहनों में मम्मी सबसे लम्बी थी,जबकि मम्मी की हाईट सिर्फ पाँच फ़ुट ही थी।
तेरह साल की बहुत कम अवस्था में मम्मी का विवाह पापा से हो गया,पापा भी सोलह वर्ष के किशोर ही थे उस समय। मम्मी बताया करती थी कि उनका गौना विवाह के एक वर्ष उपरान्त ही हुआ,लेकिन गृहस्थी संभालने के लिये चौदह वर्ष की आयु पर्याप्त नहीं थी। मम्मी का नया जीवन शुरू हो रहा था,थोड़ा पथरीला था लेकिन पापा हर डगर मम्मी के साथ थे। हम तीनों बहन भाईयों का जन्म हुआ,माँ बापुजी और मम्मी पापा के सान्निध्य में हम बड़े हो रहे थे।
मम्मी उस वक़्त बहुत सुंदर दिखती थी और एक बड़ी फ़्रेम का चश्मा लगाया करती थी,और उसी की वजह से वे क़तई घरेलु महिला नहीं दिखती थी,आत्मविश्वासी तो खैर वे सदैव से ही थी।
मुझे याद है बचपन में जब भी कभी मैं मम्मी से टाईम पुछती थी तो मम्मी अपना रेडियो चालु करती और समय बता देती थी। मुझे समझ में नहीं आता कि रेड़ियो से समय कैसे पता चलता है,मैं बहुत बार रेडियो आॅन करके देखा भी करती थी।बाद में जाकर समझ में आया कि रेडियो पर आ रहे कार्यक्रमों से मम्मी समय का अंदाज़ा लगा लेती थी। मम्मी रेडियो सुनने और किताबें पढ़ने की बहुत शौक़ीन थी। उपन्यासों का अच्छा ख़ासा संग्रह था उनके पास,जिनमें से कुछ नानाजी की धरोहर थे। मम्मी को नयी जगहों पर घुमने जाना बहुत अच्छा लगता था,इसी के चलते उन्होंने कश्मीर,उटी,मैसूर,बेंगलोर,मुम्बई,दिल्ली,गुजरात,मथुरा,आगरा जैसे स्थानों का भ्रमण किया। अपनी धार्मिक प्रवृत्ति के चलते जितने अधिक मंदिर और तीर्थस्थलों के वे दर्शन कर सकती थी,उसने अपने जीवन में किये।
मम्मी हमेशा सच बोलती थी और बिल्कुल खरा सच,बिना झुठ का सहारा लिये। किसी के भी मुँह पर कहने का साहस रखती थी। पीठ पीछे बात बनाना न उसका शग़ल था न शौक़। यही बात उसने हम बच्चों को सिखायी,मम्मी जैसे गुण तो
खैर मुझमे नहीं है लेकिन आज,मम्मी जाने के बाद उनके पदचिन्हों का अनुसरण करने को मन करता है,उनका जीवन हम सब के लिये आज एक आदर्श है।
मम्मी हमेशा लेने की बजाय देने में विश्वास करती थी। ईश्वर से वे एक ही प्रार्थना करती थी कि मेरा हाथ हमेशा देने की स्थिति में रहे लेने की नहीं और उनके ईश्वर ने सदैव उनका साथ भी दिया। सच बोलना और देना उनके जीवन जीने के आधार स्तम्भ रहे है। उसका ईश्वर ही जाने कि उसके गुप्तदानों की फ़ेहरिस्त कितनी लम्बी रही होगी।किसी भी पीड़ित के हाथ में चुपके से कुछ मदद डाल देना उसका स्वभाव रहा था। मदद भी सदैव अपनी निजी जमापूंजी से ही करती थी,कभी किसी पारिवारिक सदस्य पर दबाव नहीं डाला। जीवन के संघर्षों ने उसे अति धार्मिक बना दिया था,वह हनुमान की परम भक्त थी।
सच कहु उसकी सारी पुजा हमारे ही पाप मिटाती थी,उसकी आरती हमारे ही सिरों पर हाथ फेरती थी,उसकी परिक्रमायें हमारे जीवन की राह में फूल बिछाती थी,उसका हनुस्मरण और सुंदरकांड के पाठ हमारे ही कष्टों को दुर करते थे,उसके मंदिर में विराजमान मुसकाते लड्डू गोपाल घर में किलकारीयाँ गुंजाते थे,उसका बेबाक़ सच बोलना हमे सुरक्षा के घेरे में महसूस कराता था,अपने इष्ट के आगे झुकता उसका माथा हमे ही ऊँचा उठाने के लिये झुकता था,उसके बालों में चमकती चाँदी हमे सोना बनाती थी,उसके सिलवटें पड़े सूती वस्त्र हमे जीवन के पाठ पढ़ाते थे,उसकी इच्छाएँ हमारी खुशियों के इर्द गिर्द ही थी और शायद उसका पंचतत्व में विलीन होना भी हम सब के लिये एक बहुत बड़ा सबक़ ही था। उसके आत्मविश्वासी चरित्र ने हमे कभी डरना नहीं सिखाया था,उसका पूरा जीवन परिवार को ही समर्पित था। ऐसी मेरी माँ को मेरा नित नित नमन !

शनिवार, 26 अप्रैल 2014

माँ तू याद बहुत आती है

माँ,तू याद बहुत आती है
सब कहते है कि भुल जाऊँ तुझे
और बढ़ूँ आगे
लेकिन तू ही बता,कैसे भुलू ?
दिन रात तेरी ही याद सताती है
माँ,तू याद बहुत आती है।
सब कहते है,बीति ताहि बिसार दे
लेकिन कैसे बिसार दूँ उन पलों को
जिनमें तू समायी है
हर बात तेरी ही बात बताती है
माँ,तू याद बहुत आती है।
मेरी आँखों से तरल बहता है
होंठों से सिसकियाँ छूटती है
हर ओर तेरी सूरत नजर आती है
माँ,तू याद बहुत आती है।
मैं ब्याह के आयी,
तुझे छोड़ के आयी
तेरे बिन जीना भी सीखा
क्योंकि,तेरी बातें,तेरी नसीहतें
सीखा रही थी मुझे जीवन की हक़ीक़तें
तेरी नज़रें मेरी हर चुक को सुधारती थी
लेकिन अब ना तू है ना तेरी नज़रें
तेरा युँ मुझे छोड़ के जाना
ख़ुदा की बात ये बेमानी है
माँ,तू याद बहुत आती है।
जब तू थी
दुनियाँ बड़ी हसीं थी
और मैं उसमें मगन थी
अब तू नहीं
फिर भी हर तरफ तू ही तू है
तेरे बिन ये दुनियाँ भी बेगानी है
माँ,तू याद बहुत आती है।

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

माँ

संदेह के बादलों से
भय की हो रही है बारिश
चू रही है छत
सील रहा है सब कुछ
बन रही है
चिन्ता की रेखायें
मेरे ललाट के आस पास
लेकिन
मन के एक कोने में
दूर कही
सुनहरी धूप खिलने को है
जो हटा देगी घने बादलों को
रोक देगी बरसते पानी को
क्योकि
एक नया इंद्रधनुष बनने को है
फिर भी
ना जाने क्यो
अनजाना सा लग रहा है क़यास
कभी बिखर तो कभी बंध रही है मेरी आस
मन ही नहीं
अब तो
मेरी चौखट भी रहने लगी है उदास
क्योकि
पल पल कर रहा है छलनी मुझे
मेरी माँ को खोने का अहसास

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

कैंसर

यह तो जानती थी मैं
कि जिन्दगी एक उलझी हुयी पहेली है
अक्सर,अपने ख़ाली वक़्त में
मैं इसे सुलझाया करती थी
लेकिन यह क्रूर और निष्ठुर भी है
नहीं था मुझे ये अनुमान
हर बार यह एक नया रूप लेकर आती है
कभी हँसाती है तो कभी रूलाती है
लेकिन बहुत फ़र्क़ है महसुस करने में
और इसकी कड़वी सच्चाई को स्वीकार करने में
सच कह गये कबीरदास
जाके पैर फटी ना बिवाई वो क्या जाने पीर पराई
अपनी ही बिवाई से आज आँख मेरी भर आयी
जिसने जीवन दिया उसी के जीवन पे आँच है आयी
मिठास के ताने बाने से बुनी थी मेरी जिन्दगी
कि एक भयावह शब्द का फन्दा एेसा उलझा
उधड़ गया मेरा ताना बाना
दे गया एक ऐसा दर्द
जो अब तक था मुझसे अनजाना
हौसलों की धूप में
उम्मीदों की छाँव लिये
चलती जा रही हुँ मैं
कभी देवालयों में तो कभी गूगल की गलियों में
तलाश रही हुँ अमृत पान
ढ़ुंढ़ रही हुँ तुझे
ऐ जिन्दगी
कभी मन्नत के धागों में
कभी माँ अँजनी के लाल में
कभी कृष्ण की मुरली में
तो कभी अपने ही दृढ़ विश्वास में
क्योकि जिस किसी ने भी हिम्मत हारी
तु है उन सब पे भारी
अपने इरादों पे मुझे संशय नहीं
तेरी परीक्षाओं से भी मुझे भय नहीं
जिन्दगी,तु तो मेरे लिये
माथे पे सजा चंदन है
नित नित तेरा वंदन है
मेरी माँ के आँगन
तेरा सदैव अभिनंदन है ।

शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

हर रोज की तरह,आज भी माॅरनिंग वाॅक के बाद ,डेली न्यूज़ सुनते हुए अपने काम निपटा रही थी।यह मेरा रोज का नियम है,न्यूज़ बिना मेरी इजाज़त के मेरे कानों में जाती रहती है क्योंकि ड्राॅईंगरूम में टीवी पर सिर्फ न्यूज़ ही चलती है। मैं बिना डिस्टर्ब हुए अपने कामों में व्यस्त रहती हुँ। हाँ,कुछ ताज़ातरीन ख़बरें ज़रूर मेरी जानकारी में इज़ाफ़ा कर देती है। लेकिन...............आज की ख़बर ने मेरा दिल दहला दिया। मैं पूरी तरह से भावशुन्य हो गयी और अभी तक हुँ।
एक पाकिस्तानी नागरिक हाथ में एक कटा हुआ िसर लेकर घुम रहा था,न्यूज़ के मुताबिक़ वे जश्न मना रहे थे। संदेह है कि िसर हमारे वीर जवान हेमराज सिंह का हो सकता है,पिछले वर्ष बिना िसर के जिनका अंतिम संस्कार किया गया था। इस ख़ौफ़नाक और निर्मम करतुत को देखकर ना चुप रहते बन पा रहा है और ना ही बोलते। मैं स्तब्ध हुँ और व्यथित भी कि परिवार वालों पर क्या बीत रही होगी........?
क्या हैवानियत से उपर का कोई शब्द है इस करतुत को परिभाषित करने के लिये.............?

शनिवार, 4 जनवरी 2014

बेल

क़रीबन हफ़्ताभर पहले रसोईघर की खिड़की में रखे अपने पौधों को पानी देते समय मैंने देखा कि एक नन्हा सा अनजाना बीज गमले के एक कोने से अंकुरित हो रहा है।दुसरे दिन मैंने देखा कि वह बड़ी तेज़ी से बढ़ रहा है,कौतूहलवश मैं रोज पानी देती रही और हफ़्ते भर में एक बल खाती इठलाती बेल मेरी नजरों के सामने थी,जो मेरी रसोईघर की खिड़की से लगकर ऊपर की ओर बढ़े जा रही थी। हांलाकि अभी तक मुझे यह समझ नहीं आया कि यह बेल है किस चीज़ की,फिर भी इसकी बल खाती अदाओं ने मुझे अपनी ओर खींच रखा है। हफ़्ताभर से ना जाने कितने सबक़ यह मुझे सिखा रही है,बस उन्हीं बातों को यहाँ बाँटना चाहती हुँ।
सबसे पहले जब यह अंकुरित हुआ था तो मुझे आश्चर्य हुआ कि बिना कोई बीज डाले यह कैसे फुटा,शायद पहले का कोई बीज था जो मिट्टी में गहरा दबा था,लेकिन जैसे ही उसे मिट्टी पानी की नमी मिली वो लहरा उठा।बिल्कुल इसी तरह हम सब के अंदर भी ना जाने कितनी अच्छाइयाँ दबी पड़ी है जो अनुकूल वातावरण मिलते ही निकल आती है।अपने बच्चों के व्यक्तित्व को निखारने के लिये हमे उन्हें उचित खाद पानी देना चाहिये ताकि उनकी प्रतिभा निखर सके।
जिस तेज़ी से यह बेल बढ़ रही थी मैं स्तब्ध थी शायद इसीलिये बेटियों को बेल की उपमा दी जाती है। कहते है ना कि बेटियाँ बेल की तरह बढ़ती है पता ही नहीं चलता कब माँ के कांधे आ लगती है ठीक उसी तरह मेरी ये बेल भी सिर्फ सात दिनों में ऊपर की मंज़िल को छू गयी।
जब यह बेल ऊपर की ओर बढ़ी जा रही थी तो ना जाने क्या सोचकर मैंने इसकी एक बलखाती शाखा का मुँह नीचे की तरफ कर दिया ताकि वो खिड़की को लिपटती नीचे आ जाये ।मेरा मक़सद यही था कि मेरी पूरी खिड़की में यह लहलहाये। लेकिन ये क्या......यह तो खुल के फिर से ऊपर की ओर ही जा रही थी। मैंने दुबारा इसका मुँह नीचे की तरफ कर दिया लेकिन शायद नीचे झुकना इसकी फ़ितरत में नहीं था। मेरे तीन चार बार उसे उसकी प्रकृति के विरूद्ध चलने पर मजबूर किया लेकिन अन्ततः मैंने देखा कि बेल की वह नन्ही शाखा निर्जीव हो गयी वो जहाँ थी वही रह गयी,मुझे बड़ा दुख हुआ क्योंकि यह मेरी छेड़खानियों का ही नतीजा था। अब मैंने सीखा कि हरेक की अपनी एक प्रकृति होती है और उसी के अनुसार उसका विकास होता है,ज्यादा टोकना या उनकी प्रकृति के विपरीत कार्य करवाना व्यक्ति विशेष के विकास को अवरूद्ध करना है। मैंने युँ ही यह बात रौनक( मेरा बेटा ) को बतायी और उससे पुछा कि बेल की इस शाखा के इस तरह निर्जीव हो जाने से तुम क्या सोचते हो........उसने मुझे बेहद खुबसूरत जवाब दिया। उसने कहा कि मतलब साफ है हमे कोई कितना भी टोकें हमे हमारे स्वभाव के अनुसार ही आगे बढ़ना है ,हमे हमारे रास्ते आगे बढ़ना है चाहे राह में कितनी ही अड़चनें आये।बच्चें का यह नजरियाँ भी मुझे रास आया।
जब इसकी एक शाखा मेरी वजह से निर्जीव हो गयी तो मैंने देखा कि छोटी छोटी दो शाखायें उसी निर्जीव शाखा के उद्गम से निकल रही है।अब मेरा मन थोड़ा प्रसन्न था,मेरी ग्लानि थोड़ी कम हुयी। इसकी नन्ही शाखायें फिर से मुझे सिखा रही थी कि कभी भी हार कर मत बैठो किसी ना किसी रूप में आगे बढ़ो।आगे बढ़ोगे तो अपना अस्तित्व बनाये रखोगे नहीं तो वक़्त की मार और थपेड़े तुम्हें कब का नीचे गिरा देंगे।
अब मैं इसकी शाखाओं से छेड़छाड़ नहीं कर रही थी और यह स्वयं अपना रास्ता बनाती आगे बढ़ती जा रही थी। मैंने पुनः सिखा कि बेल की तरह हमे हमारी राह ख़ुद बनानी पड़ती है। रोज पानी देते समय मैंने ग़ौर किया कि यह सिर्फ ऊपर को ही नहीं बढ़ रही बल्कि जड़ों से भी मजबुत होती जा रही है,इसका पतला सा नाज़ुक निचला हिस्सा अब मजबुत तना बनता जा रहा है। सीख यही है कि हम चाहे सफलता की कितनी भी सीढ़ियाँ चढ़ जाये हक़ीक़त के ठोस धरातल पर अपने पाँव जमा के रखने होंगे। नींव जितनी मजबुत होगी ईमारत उतनी ही सुदृढ़ होगी।
बस,बेल की एक ही बात मुझे कचोट रही है कि यह बिना किसी सहारे नहीं बढ़ सकती,हर हाल में इसे सहारा चाहिये। एक सुदृढ़ सहारा इसे किसी भी उँचाई तक पहुँचाने के लिये पर्याप्त है।वैसे यह बात भी सीख तो देती है कि अगर हम अपने बच्चों को सहारा देंगे तो उन्हें भी उँचाईयों की हदों तक सफल बनाया जा सकता है। एक अच्छा सहारा पाकर जिस तरह बेल बलखाती ईठलाती बढ़ती है उसी तरह एक अच्छी परवरिश का सहारा पाकर हमारे बच्चें भी खिल उठेंगे।
ना जाने और भी कितनी सीखें छुपी हुयी है हमारे इर्द गिर्द ,बस उन्हे ढ़ुंढ़ के अमल में लाने की जरुरत हैं क्योंकि प्रकृति रोज एक नया पाठ सिखाती है।