सोमवार, 27 मई 2013

HT NO TV DAY

आजकल कुछ खास दिनों को मनाने का प्रचलन बहुत जोरो पर हैं, जैसे hug day,rose day,kiss day,chocolate day,mothers day,fathers day,daughters day,smile day और भी ना जाने क्या क्या ।लेकिन इन सब के बीच "हिन्दुस्तान टाइम्स" एक नई पहल लेकर आया है और पिछले दो सालों से इस मुहिम को सफल भी बना रहा है । HT NO TV DAY एक सार्थक प्रयास ।
          पिछले दो सालों में HT ने ना केवल यह शुभ कार्य प्रारम्भ किया बल्कि इसे सफल बनाने के लिए भी भरसक प्रयत्न किये और निसन्देह: वह इसके लिये बधाई के पात्र है ।
           इस "बुद्धु बक्से" ने हमारी भावी पीढ़ी को पूरी तरह से अपने चक्रव्यूह में फंसा लिया है ।गृहिणीयों की रचनात्मकता और कुशलता भी इसको भेंट चढ़ गई । जो समय परिवार के नाम होता है,वो समय भी ये डकार गया । हमे सब पता है फिर भी........... ।
            मैं यहाँ TV के गुण और दोष नहीं गिनाने वाली हुँ ,वो तो हम सब को पता है ।मेरी इस post का पूरा श्रेय है HT की टीम को , जिनके जज्बे ने हम सबको प्रेरित किया tv बंद करने को ।मैं पिछले एक सप्ताह से पेपर में इनकी गतिविधियाँ देख रही हुँ और कही ना कही उनसे जुड़ी भी हूँ । इनके प्रयास अनुकरणीय है ,इस post के जरिये मैं भी यही संदेश देना चाहती हुँ कि हम सब को इस मुहिम में इनका साथ देना चाहिए । क्या हम अपने घर की बैठक में किसी बाहर वाले को एक दिन भी आने से नहीं रोक सकते ? 
            

पश्चिम बंगाल और सिक्कीम की मेरी यात्रा

.......बस के हिचकोलों के साथ अपनी सांसों के उतार-चढ़ाव को संयत करते हुए हम आखिरकार अपने होटल जगजीत तक पंहुच ही गये । ठंड हमे कपकपां रही थी,हम जल्दी से अपने अपने कमरों में जाना चाहते थे । बच्चों का कमरा हमारे कमरे से लगकर ही था । बच्चों को मौसम का विकराल  रूप बिल्कूल अच्छा नहीं लग रहा था । 
          थोड़ी ही देर में हम सब रात के खाने के लिए dining hall में गये जो कि ऊपर की मंजिल पर था,वहाँ हम सभी साथी यात्रियों का आपस में परिचय हुआ । मुझे पता चला कि साथ वाली दोनो आंटी आपस में समधन हैं और बड़ी वाली आंटी जो कि ७५ वर्ष की है ,रिटायर्ड डाॅक्टर हैं,दुसरी आंटी म्युजिक टीचर है । मेरे बच्चों को दोनो आंटीज् बड़ी मस्त (उनकी भाषा में) लगी ।खाना बहुत लजीज़ था।हमे दुसरे दिन के कार्यक्रम के बारे में बताया गया ।
२२अप्रेल -  
  1.                  सुबह का नाश्ता करने के बाद हम लोग माॅनेस्टरी देखने गये,जो कुछ ही कदमों की दूरी पर थी ।हमारे होटल से माॅनेस्टरी पास ही दिख रही थी ।हम आठ के समुह में थे और चढा़ई वाले रास्ते से चल पड़े । स्थानीय लोगो से रास्ता पूछते-पूछते हम बढ़ रहे थे,थोड़ी ही देर में हमारी सांस फूलने लगी और हम सब को अपने शारीरिक बल का अंदाजा स्वत: ही हो गया ।अब हमने छोटा रास्ता पकड़ा,जो सीढ़ियों वाला था । बेटी ने तुरंत कैमरा मुझे पकड़ा दिया और बोली कि "wow" कितना सुंदर रास्ता है । सच,यह एक संकरा सा ,पेड़ों से घिरा, खुबसूरत पथ था , यहाँ एक अलौकिक शांति  फैली थी जो मुझे निर्वाण पथ जैसा अहसास करा रही थी । मैने खुब छायाचित्र खीचें ।
       जब हम माॅनेस्टरी पंहुचे,हम थक चुके थे । लेकिन माॅनेस्टरी की खुबसूरती देख मेरी थकान फूर्र हो गई थी और पलक झपकते ही कैमरा मेरे हाथ में था । हम प्रांगण में गये,यह बहुत विशाल था....अंदर प्रार्थना हो रही थी,लग रहा था जैसे बहुत सारे लोग एक लय में ऊर्जा उत्पन्न कर रहे हो । हमने अंदर जाने की इजाजत मांगी,जो हमे मिल गई । अंदर का दृश्य अद्भुत था । सैकड़ों की संख्या में "लामा" कतारबद्ध थे और एक सुर में प्रार्थना कर रहे थे,हरेक के आगे एक किताब रखी थी । हमे देखकर भी , इनकी प्रार्थना में कोई विघ्न नहीं पड़ा और ना ही वे विचलीत हुए, हाँ नन्हे लामा, जो कि १२ से १६ वर्ष के बीच के होंगे, हल्की सी हँसी को अपने होठो पर ना लाने का भरसक प्रयत्न कर रहे थे और इसमे नाकाम भी हो रहे थे । मैने भी चुपके से एक मुस्कूराहट उनकी ओर फेंक दी, आखिर निर्वाण के पथ पर चल रहे इन बच्चों की चंचलता को तो ईश्वर भी नहीं झुठला सकते ।
       बौद्ध की विशाल प्रतिमा का दर्शन कर हम जल्दी बाहर आ गये ताकि हमारी वजह से वे बाधित ना हो । प्रांगण से चारो ओर का  दृश्य बहुत मनोरम था,हम सब फोटो खींच रहे थे,तभी सारे लामा बाहर आ गये,नन्हे लामा अब खुल के खिलखिला रहे थे, मैने उनके फोटोग्राफ्स लिए और हम वहाँ से निकल आये क्योकि अब हमे झील पर जाना था ।
            उतरते वक्त हमने सीढ़ियों वाले रास्ते को नजरअंदाज किया ।झील थोड़ी दूर थी लेकिन हम बतियाते हुए निकल आए ,रास्ते के सुंदर नजारों को अपने कैमरे और अपनी यादों में सहेजते हुए । राह में हमे एक नन्हा सा बच्चा दिखा , जिसे देखते ही बिटीया ने गोद में उठा लिया और फोटो खिचंवाने लगी....बच्चा वाकई बहुत प्यारा था ।
                 अब हम झील की तरफ थे ।झील के दोनो किनारों को एक पुल से जोड़ा गया था । यह स्थाप्त्य कला का बेजोड़ नमुना भी था । हमने पैदल चल कर झील का चक्कर लगाया जो कि घने पेड़ों से घिरी थी ।मैने पेड़ों के आस पास बहुत सारी फोटो खिंचवाई और उस वक्त ७० के दशक की फिल्में जैसे मुझसे रूबरु हो रही थी ।
                      दोपहर के खाने का समय हो रहा था और हमे दार्जिलींग के लिए भी निकलना था इसलिए हम वापस होटल आ गए । खाना खाने के बाद हम " इनोवा" गाड़ी से रवाना हो गए ।रास्ते में हमे "नेपाल बोर्डर" पर रुकना था । 
                        दो घंटे बाद हम बोर्डर पर पहंुच गये, स्थानिय टैक्सी से हम नेपाल गये,जहाँ से हमे "शाॅपिंग" करनी थी ।रौनक बहुत खूश था,उसने फटाफट मोबाईल में नेपाल का लोकेशन डाला (जैसा कि आजकल की पीढ़ी करती है..... Status update ) ।हमने वहाँ से जूतें और कपड़ें खरीदे , मौसम के मिजाज को समझते हुए हम टैक्सी की ओर दौड़ पड़े,रास्ते में आंटी को दुकान वाले से उलझते हुए देखा ।
              हम गाड़ी में बैठ गये,ट्यूर मैनेजर हमारी गाड़ी में ही था,मौसम खराब हो चला था , मैनेजर आंटी पर चिल्ला रहा था । उसकी चिंता जायज थी,उम्र के इस पड़ाव पर सतर्क रहना सही रहता है । 
  •      रात के खाने के समय तक हम दार्जिलींग के पास " घुम" नामक जगह पर अपने होटल में पहंुच चुके थे । मौसम खराब था और बच्चों को फिर से अच्छा नहीं लग रहा था ।रात को हम सबने कुछ मजेदार खेल खेले,जिसमे मैं जीती ।अब बच्चों ने खुब मजा़ लिया ।ट्यूर मैनेजर रौनक के साथ बहुत घुलमिल गया था। एक बार फिर,खाना बहुत लजीज़ था ।रात को "ज्योतिष" (ट्यूर मैनेजर का सहयोगी) मसाला दुध लेकर आया ,दार्जिलींग की ठंड में मुझे इसकी जरुरत भी थी ।

शनिवार, 25 मई 2013

पश्चिम बंगाल और सिक्कीम की मेरी यात्रा


मैं बहुत उत्साहित थी,अपनी इस यात्रा को लेकर । पूरे दो सालों के बाद , फुर्सत के कुछ पल जूटा पाई थी मैं । हालांकि लेह की यादें अभी भी मेरे जेहन में ताजा थी,लेकिन एक नया पड़ाव मुझे अपनी ओर खींच रहा था ।
       २१अप्रेल की हमारी "बुकिंग" लगभग तीन महीनों पहले हो चुकी थी। हमारी तैयारियाँ भी काफी समय पहले शुरु हो चुकी थी.....और फिर मुम्बई की चिपचिपाहट वाली गरमी भी जैसे हमे किसी पर्वतीय स्थल पर धकेल रही थी......।

२१अप्रेल :- हमारा "ट्यूर" बागडोगरा से प्रारम्भ हुआ। मुम्बई से बागडोगरा की हमारी यात्रा दो चरणों में पूरी हुई.....। सुबह करीब साढ़े तीन बजे हम घर से निकले.... हवाईअड्डे की औपचारिकताओं को निपटा कर छः बजे हमने उड़ान भरी,आठ बजे तक हम दिल्ली पहुंचे और दुसरी हवाईयात्रा का इंतजार करने लगे,जो कि ११ बजे की थी । दिल्ली हवाईअड्डे की खुबसूरती निहारने में कब ११ बज गये पता ही नहीं चला ।अब हम हमारे गंत्व्य स्थल की यात्रा की ओर अग्रसर थे.....और १२:३० पर हम बागडोगरा हवाईअड्डे पर खड़े थे ।
       हमारा "ट्यूर मैनेजर" हमारे स्वागत के लिए पहले से ही वहाँ मौजूद था ..... एक मिनी बस हमारे इंतजार में थी । हम गरमी से व्याकुल हो रहे थे,दूसरे साथी यात्री अभी आने बाकी थे.....।दो सहयात्री आ चुके थे....दोपहर के खाने का समय हो चुका था.... पेट में धमा-चौकड़ी मचा रहे चुहों की फौज ने हमे जल्दी ही खाने के पास पहुंचा दिया । हमारे खाना खाने के दौरान ही बाकी सहयात्री भी आ चुके थे । ५-६ बजे के करीब हमने मिरिक की ओर प्रस्थान किया ।हम ३५ के समूह में थे और दो बसों में थे ।
                  यात्रा के चलते ही गरमी हाथ छुड़ा के भाग गई और मंद बयार मेरे बालों के साथ खेलने लगी । हम दोनो पास पास बैठे थे , और लड़ाई झगड़े के चलते दोनो बच्चें मुँह फुलाकर अलग अलग कोनों में बैठ गये । 
                            जैसे जैसे हम ऊपर की ओर चढ़ते गये,मौसम खराब होने लगा ।मेरे पास वाली सीट पर दो आंटी बैठी थी, ६०-७० की उम्र की इन महिलाओं का जज्बा़ देखकर मैं स्तब्ध थी,और पूरे "ट्यूर"के दौरान कई बार मैने उनके जज्बें को सलाम किया ।
               ट्यूर मैनेजर से मिरिक के बारे में जानकारी लेते हम आगे बढ़ रहे थे ।यह पश्चिम बंगाल के दार्जीलिंग जिले की एक छोटी सी सैरगाह है,जो समूद्रतल से ५८०० फीट की ऊँचाई पर स्थित है ।बातों-बातों में पता ही नही चला कि बाहर अंधेरा घिर आया है और मौसम अलमस्त हो पूरा बिगड़ने के अंदाज में था । घना कोहरा,घूप्प अंधेरा,पतली सी सड़क जिसे पगडंडी ही कहे तो ज्यादा उचित होगा,टेढ़े-मेढ़े रस्ते और झमाझम बरसात..... कूल मिलाकर हाॅरर फिल्म के बैकग्राउंड सीन जैसा दृश्य था..... मैने बच्चों को संभाला जो अकेले बैठे थे....शगुन एकदम आगे बैठी थी,उसके पापा उसके पास बैठ गये और मैं रौनक के पास ।
         धीरे-धीरे सब चूप हो गये ।एक सन्नाटा सा पसर गया बस में,जिसे बिजली की तेज गड़गड़ाहट बीच बीच में तोड़ देती थी ।घने कोहरे में हमे कुछ नहीं दिख रहा था लेकिन फिर भी हमारा ड्राईवर बड़े ही आत्मविश्वास से बस चला रहा था,वो भी फोन पर बतियाते हुए...बड़ी कोफ्त हुई थी इन मोबाईल फोन बनाने वालों पर ।बारिश तेज हो चली थी...... बल्कि भयकंर बरसात में तब्दील हो चुकी थी......कि तभी एक चमकती हुई विद्यूत रेखा पूरे अट्टाहस के साथ बस के एकदम पास से नीचे चली गई...... हम सब सकते में आ गये ,अब तो हर दूसरे तीसरे मोड़  पर ये विद्यूत रेखा हमसे मिलने आती रही,उस रेखा की रोशनी में मैने आस पास वालों के चेहरे देखे,जो कुछ डरे हुए प्रतीत हुए ।ड्राईवर अब भी फोन पर बात कर रहा था..... इसलिए हम सब और भी सतर्क थे,बस का वाईफर भी काम नहीं कर रहा था.......और उस पर घना कोहरा ।सब जैसे बुत बन गये थे,खिड़की के बाहर देखो तो कलेजा मुहँ को आता था.......वैसे भी सबकी नजर ड्राईवर पर ही लगी थी,.और जब कभी सामने से दूसरा वाहन आ जाता था तो मुझे हमारा ड्राईवर हनुमान सा लगने लगता ।देवों के देव,सबके रक्षक हनुमान स्वतः ही मेरे मन पर हावी हुए जा रहे थे,और शायद सभी के मनों पर ।
                                                 मुझे अपनी यह यात्रा बिगड़ते मौसम के आगे बली चढ़ती सी लगने लगी ।बस प्रभु स्मरण के साथ सकुशल होटल पहुंचने की इच्छा ही अधिक बलवती थी । रौनक ने मुझसे पूछा कि हम ऐसी जगहो पर ही घूमने क्यो आते है, गुजरात,राजस्थान और केरल क्यों नही जाते ? ....और मैं बस मुस्कूरा दी.....