मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

नया साल

जीवन का एक और वर्ष ले रहा है विदा
अब कहना है निराशा को अलविदा
कुछ यादें छलकी सी
कुछ यादें धुमिल सी
कुछ खुशियों भरी ओस की बुंदों सी
कल से बन जायेगी धरोहर
बीते हुए साल की
नये सपनों के संग
शुरुआत होगी नये साल की
कल का सुरज
मिटा देगा कोहरा
आसां हो जायेगी मुश्किल राह की
रात गयी सो बात गयी
जगी है ललक अब कुछ पाने की
हम बढ़े,सब बढ़े और बड़ी हो सोच सबकी
ना कुछ तेरा ना मेरा
ये जीवन तो है नियामत ख़ुदा की
बस....
खुश रहे सब
चाह बढ़ जाये जीने की

रविवार, 15 दिसंबर 2013

हवा

मेरी चुप्पी को घमंड
मेरे शब्दों को प्रचंड
बतियाते नयनों को उदंड
और
मधुरता को मनगढ़ंत
समझते है लोग
लेकिन दोष लोगों का नहीं
कमबख़्त .....
हमारी राह से गुजरने वाली हवा की
फ़ितरत ही कुछ ऐसी है ।

बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

करवां चौथ

ऐ चाँद,आज तु भी जरा इठलाना
पूरो शबाब से आसमां में उतरना
खुशियों के छलकाना जा़म
क्योकि आज की ये खुबसुरत शाम
तेरे और मेरे प्रिय के नाम
ऐ चाँद, देख जरा नीचे
सज धज के खड़ी सुहागिनें
कर रही तेरा इंतजार,करके सोलह श्रृंगार
बादलों की ओट से तु झांकना
लगी है टकटकी,जो झलक तेरी दिखी
खिल जायेगे सबके चेहरे,चलेगा तेरा जादु
क्या प्रोढ़ा,क्या यौवना और क्या नववधु
ऐ चाँद,तु साक्षी बनेगा प्यार का
देखेगा आस्था की रात में घुलता ऐतबार
आज तो यार से भी पहले होगा तेरा दीदार
लेकिन सुन जरा,
भले ही धरती पे ना उतर
लेकिन आसमां में जल्दी तु आना
मैं भी हुँ प्यासी तेरे दीदार की
जल्दी तु आना
होगा प्यार का समर्पण
करके तुझको जल अर्पण
करवां चौथ की हार्दिक बधाईयाँ

शनिवार, 12 अक्तूबर 2013

दशहरा

"राम ने रावण को मारा"
यह वाक्य बचपन में ना जाने कितनी बार मैनें अपनी सुंदरलेख की पुस्तक में लिखा था,उस वक्त मेरे लिये यह महज ऋुतिलेख और सुंदरलेख का एक वाक्य भर था,जिसे मैं साठी (कलम का एक प्रकार) की सहायता से अपनी पुस्तक पर उतारती थी।बचपन की यादों में तो यही अंकित था कि रावण दस सिरों वाला एक राक्षस था जिसे भगवान राम ने अपने धनुष बाण से मार दिया था.....उस दिन से हम दशहरा मनाने लगे।समय के साथ विजयादशमी के गुढ़ अर्थ भी समझ में आने लगे कि राम और रावण तो प्रतिक मात्र है अच्छाई और बुराई के,वैसे व्यक्तिगत रूप से तो रावण महाविद्वान पुरूष थे।रावण जैसे ज्ञानी दुश्मन के साथ युद्ध करके स्वयं राम ने भी खुद को गौरवािन्वत महसुस किया था ।रावण को जितना पढ़ा,समझा....इतना ही जाना कि शिव का यह परम भक्त,महाज्ञानी था,ना सिर्फ शस्त्र विद्या में बल्कि वेदों का भी प्रकांड पंडित था। लेकिन उसकी एक बुराई ने उसका महाविनाश करवा दिया।वो दसानन एक बुराई के चलते मृत्यु को प्राप्त हुआ।
लेकिन आज के रावण का विनाश क्या उसकी एक बुराई की वजह से हो पायेगा।वो रावण दस सिर वाला था,शस्त्र और शास्त्र दोनो का ज्ञानी था,लेकिन आज का रावण एक सिर का है ओर दस तरह की बुराईयों को साथ लेकर चलता है तथा अपने झुठे दंभ का अभिमानी है।उस रावण के विनाश के लिये राम को अवतरित होना पड़ा........लेकिन आज के रावण के,आज के दसानन के वध के लिये कोई अवतार नहीं।स्वयं भगवान भी असमंजस में है.....
आज घर घर में रावण पाऊँ
इतने राम मैं कहाँ से लाऊँ ???????????

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

निर्भया


आँखें मेरी खुशी से है नम
निर्भया के गम
कुछ तो हुए होंगे कम
माना कि तेरी आत्मा
सिसकती है अब भी
तेरी माँ की आँखों से
आंसू बन के
बहती है तु अब भी
लेकिन
माँ की आँखों में
आज तु खुशी बन के
उमड़ी है
तेरे गुनहगारों को मिली है फांसी
अब आगे
नहीं बनेगी कोई निर्भया अभागी........
.............देश की न्यायव्यवस्था और मीडिया दोनो को धन्यवाद,यह संदेश है गुनहगारों के लिये ।

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

निर्भया


मेरी खिड़की से आ रही गड़गड़ाहट आज
उपर गरज रहे बादल
तो नीचे धुम धड़ाका विसर्जन का
झुम रहे गणपति भी
गा रहे सब
गणपति बप्पा मोरया
लेकिन मेरा मन
खोया है कही ओर
चिल्ला चिल्ला के कह रहा
निर्भया....निर्भया....निर्भया
मुझे नींद ना आयेगी आज
जब तक दरिंदों के सर
फांसी का ना सजेगा ताज
देश का सम्मान है तु
तु ही है मेरा भी मान
मिला अब तो तुझे
बप्पा का भी आशिर्वाद
आसमां से बुंद-बुंद बरस रही तु
मत रो,लाडली
अब खौल रहा सबका लहु
तु चिन्ता मत कर निर्भया
तेरे गुनहगारों को मिलेगी सजा
खिड़की से आ रही आवाज
गणपति बप्पा मोरया
....
फैसले के इंतजार
है तेरी निर्भया......

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

बेटी का जन्मदिन

आज बिटिया का १४ वां जन्मदिन है,आज के दिन मेरे मन का ये कोना उसके नाम


बेटियाँ जल्दी बड़ी हो जाती है
घुटनों के बल चलती वो कब दौड़ने लगी,
मेरी अंगुली पकड़ कर चलने वाली,
कब मेरे कांधे आ लगी
मुझे पता ही ना चला
बिटिया अब सयानी हो चली है
पेंसील की जगह पैन चलाने लगी है
शब्दों की तुकबंदी के साथ कलम से भी
अब वो खेलने लगी है
अब वो तुतलाती नहीं
अंग्रेजी में बड़बड़ाती है
परिवार के नन्हे बच्चों को
टीचर बनकर पढ़ाती है
घर में, स्कुल में दादागिरी दिखलाती है
लेकिन सच कहु,हर जगह
खिचड़ी में घी के जैसे घुल जाती है
उसके छोटे छोटे सपनों में
खुशियाँ बड़ी समायी है
हर जन्मदिन पर वो एक साल बड़ी हो जाती है
बिल्कुल सच है
बेटियाँ जल्दी बड़ी हो जाती है
बच्चों में जान उसकी अटकती
नहीं किसी से वो डरती
हम सबकी वो दुलारी है
सहेलियों को भी उतनी ही प्यारी है
मेरे घर की वो धुरी
आँगन में तितली सी मंडराती हैं
नाक पे बैठा गुस्सा उसको
डांट बड़ी पड़वाता है
दुजे ही पल वो मुसकाती है
भाई को बड़ी धमकाती है
कभी कभी मुझसे भी होड़ कर जाती है
जब दो लाईने लिखकर
निबन्ध में प्रमाणपत्र वो पाती है
कभी समोसा कभी कचोरी तो कभी बड़ापाव,
काला खट्टा को चुसे जाती है,
जब स्कुल से घर वो आती है
पापा बड़े खुश हो जाते,
जब दोनो मिलके हाजमोला खाते है
मेरे घर की बगियाँ महकाती है
आँखों में अब वो काजल सजाती है
क्योकि सच है
बेटियाँ जल्दी बड़ी हो जाती है.......

गुरुवार, 1 अगस्त 2013

पश्चिम बंगाल और सिक्कीम की मेरी यात्रा


२३ अप्रैल - सुबह की किरणें आज मेरे कमरे में नहीं आ रही थी.....अलसायी आँखों से मैने खिड़की के बाहर देखा....घने पेड़ों ने मेरी सिहरन बढ़ा दी । मैने बच्चों को उठाया,उनके कमरे की खिड़की से कंचनजंघा पर्वतमाला दिख रही थी और उसकी खुबसुरती बयां करने की नाकाम कोशिश मैं यहाँ नही करना चाहुंगी ।
चाय नाश्ते के बाद हम घुमने के लिये निकल गये ।सबसे पहले हमे माॅनेस्टरी जाना था और थोड़ी ही देर में हम दार्जिलींग की "माॅनेस्टरी" के सामने थे । माॅनेस्टरी के चारो तरफ लहराते झंडे वातावरण में आस्था घोल रहे थे और लग रहा था कि अतिथियों के स्वागत में उनके रंग कुछ ज्यादा ही सुर्ख हो गये हो ।सुबह का समय था,प्रार्थना हो रही थी,हमे थोड़ी देर इंतजार करना पड़ा । संशय नहीं कि माॅनेस्टरी बहुत संुदर थी लेकिन मिरिक की माॅनेस्टरी निश्चित रूप से मुझे लुभाने में थोड़ी अधिक कामयाब रही । हमने फोटोग्राफ्स खींचे और वहाँ से "राॅक गार्डन" के लिये निकल चले ।
"राॅक गार्डन",पर्यटकों को आकर्षित करने के लिये बनाया गया था और यह "चंडीगढ़" के राॅक गार्डन से पूरी तरह भिन्न था । एक पतली सी पगडंडी जैसे रस्ते से हम गार्डन की ओर जा रहे थे । मेरे मन में उत्सुकता बनी हुई थी क्योकि आस पास का माहौल और फिज़ा में घुलती ठंडी हवा इसकी खुबसूरती की दस्तक मेरे मन में पहले ही दे चुकी थी । कल कल की ध्वनी भी हवा के साथ मेरे कानों के पास सरसरा रही थी । गार्डन की हरियाली किसी को भी मुग्ध करने के लिये पर्याप्त थी और उस पर शांत निश्छल बहती एक छोटी सी धारा , जो पत्थरों से टकरा कर एक संगीत पैदा कर रही थी । हम सब पत्थरों पर अपनी जगह बना कर बैठ गये । मेरा मन चंचल हुआ जा रहा था,हवा के लागातर बह रहे झोंकों के साथ पानी की हल्की फुहारे मेरे तन मन को भीगो रही थी । मैं और बच्चें पत्थरों पर इधर से उधर झुम रहे थे,पानी का तेज प्रवाह जैसे मुझे खींचकर मेरी उम्र से काफी पीछे ले गया हो और मेरा मन झुमती हवा के साथ चहचहाने लगा , ठंडे स्वच्छ पानी में पांव डालकर बैठने का लोभ संवरण मैं नहीं कर सकी । बच्चों ने खूब फोटो खिंचवाई । हम थोड़ी देर के लिये गार्डन में रखी बैंचों पर बैठ गये ,वहाँ से देखने पर उस नन्ही धारा की हिलोरें लेती कलरव ध्वनी ने मुझे जैसे मोहपाश में बाँध दिया हो ।बच्चे अभी भी फोटो खिंचवाने में लगे थे और हम दोनो कुछ मीठे से पलों को अपनी जमा पूंजी बना रहे थे । भगवती भाई(ट्यूर मैनेजर) के आवाज देने पर हम वहां से रवाना हुए ।
अब हम "रिम्बी फाॅल" देखने वाले थे,यह ठंडे पानी का एक निश्चल झरना था । यहां पर मैने और शगुन ने सिक्कीम के पारम्परिक वस्त्र "भुतिया" में फोटो खिचंवायी,यकीन मानीये , कपड़े इतने सुंदर थे कि पहने रखने की इच्छा मन में हिलोरे ले रही थी । लेकिन हमेशा की तरह सुशील जल्दबाजी में थे । भगवती भाई ने हमे बताया कि अब हम kacheopalri lake जाने वाले है,यह झील देवी के पदचिन्ह के रूप में है । झील के आस पास का वातावरण एकदम निर्मल था,यहां कचरा करना सख्त मना था,और एक मान्यता के अनुसार शाम सात बजे के बाद पक्षियों का एक झुण्ड आता है और सारा कचरा उठा ले जाता हैं .....दिलचस्प ।
रात को होटल में एक बच्ची का जन्मदिन मनाया गया,रोज की तरह स्वादिष्ठ खाने की महक इस तरह से मेरे नथुनों में बस जाती कि वजन बढ़ने की परवाह ना करते हुए मैं बस अपना पुरा ध्यान खाने पर ही केन्द्रित कर लेती ...........

मंगलवार, 18 जून 2013

पश्चिम बंगाल और सिक्कीम की मेरी यात्रा


२२अप्रेल - 
              रोज की तरह आज भी यह एक खुशनुमा ताजगी भरी सुबह थी ,नाश्ता करने के बाद हमे पीलिंग के लिये निकलना था और रास्ते में "रीवर राफ्टींग" के लिये रूकना था,रौनक इस बात को लेकर बहुत उत्साहित था । मैं बहुत जल्दी उठ चुकी थी और बेसब्री से ज्योतिष के चाय लाने का इंतजार कर रही थी । मन थोड़ा उदास भी था क्योकि मैं सूर्योदय देखने "टाईगर हिल" नहीं जा सकी थी । मेरी नजर शगुन पर पड़ी, जो गहरी नींद में सोयी थी । अब उसकी तबियत थोड़ी ठीक लग रही थी मतलब मेरा आगे का दिन अच्छा जाने वाला था इसलिये मैंने एक झटके में अपने मायूस मन को दूर भगा दिया ।कड़क चाय की प्याली ने गजब का असर किया और मैं आनन फानन तैयार हो गयी...... नाश्ते में थोड़ा समय था । हम होटल के बाहर चहल कदमी कर रहे थे कि ज्योतिष ने बताया कि होटल के पीछे जाइये , पूरा कंचनजंघा आपको नजर आयेगा । लगे हाथ हम वहाँ पहुंच गये । मैं स्तब्ध थी और मन ही मन अफसोस कर रही थी कि पिछले दो दिनों में मैंने ये खुबसूरती क्यों नहीं देखी । सात बजे का समय था, मौसम एकदम साफ था इसलिये कंचनजंघा की खुबसूरती पूरे शबाब पर थी,सूरज की सुनहरी किरणें इसके दुधियाँ रुप को अलौकिकता से दमका रही थी । आसमान की ओर सिर उठाये यह किसी बेहतरीन ताज से कम प्रतीत नहीं हो रहा था । आवारा बादल इसे अपने आगोश में लेने की नाकाम कोशिश कर रहे थे, इसके इर्द गिर्द अठखेलियाँ कर रहे थे और यह उन आवारा बादलों के पीछे से ऐसे सज के निकलता था कि कोई भी बावरा हो जाये । निष्कलंकता से चमकता इसका निश्चल दुधियां रंग मेरी आँखों में हमेशा के लिये बस गया । मैं भी बादलों की तरह उसके पास जाना चाहती थी ,उसे स्पर्श करना चाहती थी जोकि असम्भव था.......खैर,जैसे ही बादल उस पर से अपना आवरण हटाते मेरा कैमरा अनियंत्रीत रूप से उसे संजोना शुरू कर देता......और जब मेरा मन उसकी खुबसूरती को अपने छायाचित्रों में सहेजने में कामयाब हो गया,तो पुरी संतुष्टी के साथ मैने एक तिरछी नजर उन बादलों पर डाली जो अभी भी उसको आलिंगनबद्ध करना चाहते थे ......मैं मुस्कुरायी,वो नाकाम थे और मैं उसे कैद कर पायी थी अपने चित्रों में और अपनी यादों में । यह मेरी जीत थी उन आवारा से बादलों पर ।
       हम नाश्ता करने डाईनिंग हाॅल में गये,हमारे बाकी के साथी सूर्योदय को देखकर आ चुके थे। उन्होने मुझे वहाँ के फोटोग्राफ्स दिखाये,संदेह नहीं कि वो अद्भुत थे ,मेरे मन को ललचाने के लिये पर्याप्त थे,फिर मैने भी उन्हे अपना खजाना दिखाया,जिसे कुछ समय पहले ही मैने अपने मन की तिजोरी में सहेजा था । वो सब भी इन नजारों को अपने कैमरे में कैद करने होटल के पिछवाड़े गये ,लेकिन तब तक उन आवारा बादलों ने उसे अपने आगोश में ले लिया था और किसी कीमत पर उसे छोड़ना नहीं चाहते थे ...... मौसम की इस बेईमानी को देखते हुए हम सब चुपचाप वहाँ से निकल लिये ।
                     हमने नाश्ता किया और अपनी अपनी गाड़ियों में पीलिंग के लिये निकल पड़े । अब हम पश्चिम बंगाल से सिक्कीम में प्रवेश करने वाले थे ।रास्ता बहुत सुंदर था,हरी भरी वादियां मानो हर राह पर हमारा स्वागत कर रही हो । उबड़ खाबड़ रास्ते अब थोड़े समतल होने लगे,किसी राजधानी की तरफ जाने का अहसास हमे स्वयं ही होने लगा,वरना अब तक तो हमने रास्तों के गड्ढ़ों को ही ज्यादा महसुस किया था । "दीदी" की खराब सड़कें हमे कतई पसंद नहीं आयी थी, लेकिन सिक्कीम की चिकनी चौड़ी सड़के देखकर एक सुखद अहसास हुआ क्योंकि अब तक हम बहुत झटकें सहन कर चुके थे ।
                यह रास्ता मोहक तो था ही और इस पर नदी तिस्ता भी हमारे साथ हो ली,बस फिर क्या था,मन गुनगुनाने लगा । हवा के मंद झोंकें अब लेह की यादों को मेरे मन से धकेलने लगे थे ।लग रहा था जैसे तिस्ता नदी ने हमारा दामन पकड़ लिया हो ।एक पल को वह ओझल हो जाती तो दुसरे ही पल फिर से अपनी मस्ती के साथ हमसे मिलने आ जाती । कही कही उसकी लहरें उग्र रुप से खतरनाक थी तो कही शांत पर थोड़ी सी चचंल,लेकिन जैसे जैसे हम आगे बढ़ते गये यह गंभीर होती गयी और फिर आगे चलकर यह आश्चर्यजनक रुप से शांत हो गयी । मेरी उत्सुकता बढ़ गयी । मैंने ड्राईवर से इस बारे में पुछा तो उसने बताया कि यहाँ पर बाँध बनाया गया है इसलिये यह यहाँ रुक गयी है । एक बारगी मुझे लगा जैसे किसी चचंल से बच्चें के हाथ ही बांध दिये गये हो ।निःसंदेह मुझे तिस्ता की चचंल लहरों की कमी खल रही थी और उसकी स्वतंत्रता का हनन मुझे कदापि पसंद नहीं आया ।
   अब हम उस स्थान पर पहुंच गये जहाँ से हमे रीवर राफ्टींग प्रारम्भ करनी थी ।मुझे थोड़ा डर लग रहा था ,लेकिन दोनो बच्चें और सुशील तीनों राफ्टींग करने वाले थे तो बाद में मैं भी इनके साथ हो ली,और यह मेरा अब तक का सबसे रोमांचक अनुभव रहा ।बोट में हम छः लोग सवार थे और दो लोग बोट के साथ थे । हमे आपात स्थितीयों के बारे में बताया गया,मुझे थोड़ा डर सा लगा ,तब सुशील ने कहा कि यह सब हवाईजहाज में भी बताया जाता है लेकिन कभी कोई एरोप्लेन क्रैश हुआ है । उनका तात्पर्य यही था कि ये सब औपचारिकतायें है । हम सब बोट में बैठ गये,रौनक और सुशील ने चप्पु संभाल लिया , उन्हे बोट वालों के कहे अनुसार चप्पु चलाना था । शगुन एकदम आगे थी,उसे भी पानी की धारा के हिसाब से बोट के अगले हिस्से वाले किनारे पर झुक जाना था । सारे नियम समझने के बाद हम चल पड़े ।पानी के बहाव के साथ बोट तेजी से आगे जा रही थी । हल्की लहरें इसे उपर नीचे कर रही थी और मैं इन आनंददायी झुलों का आनंद ले रही थी । तभी हमारा सहायक तेज आवाज में बोला , "शगुन लीन डाउन " । शगुन ने अपना पूरा वजन आगे के किनारों पर डाल दिया । मैंने देखा कि हमारी बोट तीव्र लहरों के बीच जाने को थी,हम सब खुशी के मारे चिल्लाये और उसी क्षण हमारी बोट तेजी से उपर की ओर उठ कर इस तरह से नीचे को गयी जैसे कि पानी में समा गयी हो । ठंडे पानी ने हमे पूरी तरह से भीगो दिया था । उस समय मैं अंदर से  शुन्य सी हो गयी थी ,यह रोमांचक अहसास मुझमे एक नयी उर्जा का संचार करने को था । तिस्ता की इन्ही लहरों से बतियाते हम किनारे की ओर आने लगे । हमारी बोट का सहायक जो कि १४-१५ साल का लड़का ही था,पानी में कुद पड़ा और लहरों के बहाव के साथ अपने शरीर को भी बहने छोड़ दिया,बिना हाथ पावं मारे ।उसने हमे भी पानी में उतरने बोला कि पानी का बहाव आपको किनारे ले जायेगा । शगुन कुदने को तैयार हो गयी (जबकि उसे स्विमिंग नहीं आती) ।स्वभावतः वह बहुत निडर लड़की है । हमने उसे मना कर दिया कि तभी रौनक पानी में कुद गया , उसे तैरना आता था इसलिये हम निश्चित थे ।अत्यधिक ठंडे पानी की वजह से वह वापस बोट में आ गया ।शगुन अब भी पानी में उतरने की जिद्द कर रही थी । किनारे पर भगवती भाई खड़े थे और हमारे चेहरे देखकर हमारी प्रतिक्रिया जानने की कोशिश कर रहे थे,हम सब खुशी से चिल्ला उठे ।
                             अब तक का यह मेरा सबसे रोमांचक क्षण था और मेरा ही नहीं समुह के सब लोग रोमांचित थे । खासकर सभी बच्चें बड़े खुश थे । तिस्ता नदी की किलोल करती लहरें और पहाड़ों को लगकर गुजरती ठंडी हवा अब भी मुझमे एक सिहरन पैदा कर रही थी । 
                 पास ही में एक छोटे से ढ़ाबे पर हमारे खाने की व्यवस्था थी । हमने कपड़े बदली किये और खाना खाया हालांकि खाना ज्यादा स्वादिष्ठ नहीं था लेकिन फिर भी सब खुश थे क्योकि रीवर राफ्टींग का रोमांच सभी पर हावी था ।
            अब फिर से हम पीलिंग की राह पर थे । रात करीबन आठ बजे हम वहां पहुंचे । हम होटल के अपने कमरों में गये । कमरे बहुत सुकून भरे और साफ सुथरे थे । रात का खाना खाकर हम जल्दी ही बिस्तरों में घुस गये ...........

शनिवार, 8 जून 2013

पश्चिम बंगाल और सिक्कीम की मेरी यात्रा


"घुम" की सर्दीली रात में एक गहरी नींद के पश्चात अलसुबह सूरज की पहली किरण मेरे कमरे की खिड़की से मुस्कूरा रही थी । मैंने भी खिड़की खोलकर खुली बाँहों से इन नन्ही किरणों का स्वागत किया और अपने सर्द कमरे में पसरने का मौका दिया ।
.....तभी दरवाजे पर दस्तक हुई, खोला तो सामने ज्योतिष को चाय की केटली के साथ खड़ा पाया । मैने चार चाय ली और और बच्चों को उठाया ।कड़क चाय की चुस्कियों के साथ मैं एक खुबसूरत दिन की शुरूआत करने वाली थी ।
आज हम पूरा दिन दार्जिलींग की वादियों में सैर करने वाले थे,हमने फटाफट अपना नाश्ता किया और भगवती भाई के साथ निकल पड़े । रास्ता बहुत मनभावन था और सर्द हवा का झोंका , हमारी शीशे चढ़ी गाड़ी में भी आकर हमारी सिहरन बढ़ा जाता था । मेरा मन इन वादियों में हिंडोले लेने लगा,हालांकि लेह की वादियाँ और यादें अभी भी मेरे मन मस्तिष्क पर अपना कब्जा जमाये थी ।
सबसे पहले हम चिड़ियाघर देखने गये । वहाँ पर हमने लाल पांडा देखा,जिसे हमने पहले कभी नहीं देखा था ।चिड़ियाघर के ही एक तरफ संग्रहालय था जहाँ पर हमे पर्वतारोहण से संबंधित चीजों की जानकारी दी गई । रौनक और शगुन बड़ी दिलचस्पी के साथ सब देख रहे थे । हमे माऊंट एवरेस्ट के बारे में कई रोचक किस्से जानने को मिले । अपने भारत के समृद्ध इतिहास को देख सुनकर मैं फुली नहीं समा रही थी ।हमारा गाइड भी हमे रोचक तरीके से सब समझा रहा था,बीच बीच में मैंने महसूस किया कि जब कभी भी भारत की उपलब्धियों की चर्चा होती तो गाइड की आँखों में एक चमक सी फैल जाती ,ना जाने क्यों वो चमक मेरी भी आँखों में आ जाती और मुझे गर्वित होने का मौका देती । वही पर एक महाविद्यालय भी था जो पर्वतारोहियों को ट्रेनिंग देता था और यहाँ विदेशों से भी छात्र पढ़ने आते है ।
वहां से हम लोग रिफ्युजी सेंटर गये । यह सेंटर देखते समय मेरी आँखों में मुझे कुछ पिघलता हुआ सा प्रतीत हुआ । बुजूर्गों द्वारा बनाये गये सामान को देखकर मेरी आँखे खुली की खुली रह गई , मैने थोड़ा कुछ सामान लिया और ललचाई नजरों से बाकी सब चीजों को देखने लगी, ऐसी चीजों के प्रति मेरी दीवानगी सुशील(पति) से छिपी नहीं थी...... अपने बजट के बिगड़ने के डर से वे बड़ी ही कलाकारी से मुझे वहाँ से निकाल लाये । खैर,........मैंने उन बुजूर्गों से उनकी उम्र पुछी,वे सब अस्सी वर्ष से उपर के थे,मैने बच्चों के साथ उनके फोटोग्राफ्स लिये और यकीन मानिये उन वृद्ध चेहरों की सिलवटें एक स्मित रेखा से खिल सी गयी । उनके आशिर्वाद देते हाथ मेरे बच्चों को भी खुश कर गये,उन काँपते हाथों के आशिष को अपने हृदय में समाये हम चल पड़े दार्जिलींग के प्रसिद्ध टी गार्डन की ओर ।
चाय के बागान देखकर हम विस्मित हो गये,मैं तो ईश्वर की प्राकृतिक छटाओं को देखने में ही व्यस्त थी तभी रौनक ने मुझसे कहा कि मम्मी आप ग्रीन कलर के शेड्स देखो । सच, हरे रंग की एक एक छटा अपने आप में अद्वितीय थी ।कही गहरा,कही हल्का,कही पीले के साथ घुला हुआ तो कही लाल के साथ तालमेल बिठाता हुआ,कही सूर्ख तो कही फीका सा .......अदभुत.....अनुपम ।हरी वादियाँ मेरे पांवों में बिछी थी ..... मखमल पर चलने सा अहसास था यह ।फिर से हमने खुब सारी फोटो खिंची । हरे बागानों के बीच खड़ी लाल जींस,पीला शर्ट पहने हरे पीले जुतों में अपनी बिटीया को देख मेरा कैमरा स्वतः ही क्लिक होने लगा,ईश्वरीय रचना की खुबसूरती के साथ मेरी अपनी कृति की सुंदरता को देखकर मुझे गुमान हुआ खुद पर भी और अपने अंश पर भी । मैं इस बार भी बहुत आगे तक चली गई कि तभी भगवती भाई ने आवाज दी ।मुझे याद आया कि मुझे यहाँ से चाय खरीदनी हैं,हमने अलग अलग तरह की चाय का स्वाद लिया और पिछले तीन दिनों से पी रही चाय का स्वाद मेरे मुंह में घुल आया । हमने छः किलों चाय खरीदी ,भगवती भाई चाय की इस खरीदारी पर मुस्कूरा रहे थे,मैंने उन्हे स्पष्ट किया कि ये सब मेरे प्रियजनों के लिये उपहार स्वरूप हैं ।
भगवती भाई और हम चारों हमारी गाड़ी में बैठ गये ।राह में आ रही हर चीज मुझे लुभा रही थी ।सबसे ज्यादा मुझे प्रभावित किया स्थानिय लोगो ने ........ पिछले दो दिनों से आते जाते मैं इन पर नजर डाल रही थी और बहुत कुछ अध्ययन भी कर रही थी जैसा कि मेरा स्वभाव है ।मैने पाया कि यहाँ की महिलायें की संरचना में ऊपरवाले ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी,बला की खुबसूरत लड़कियाँ.....आत्मविश्वास से लबालब.....जिन्हे देखते ही उनके सुशिक्षित होने का अंदाजा स्वतः ही लग जाये ।अत्याधुनिक कपड़ों से सजी इन लड़कियों की आँखों में कही कोई खौफ नहीं,कही पीछा करती आँखें नहीं ।एकदम सौम्य तरीके से संवरे सीधे बाल,आँखों पर सुघड़ रूप से लगा लाईनर और लापरवाही अंदाज में च्यूंई्गम चबाती ये लड़कियाँ मेरे मन में घर करती जा रही थी,सुशील की नजरों में भी इस खुबसूरती के लिये आ रहे भावों को मैने पहचान लिया । सबसे बड़ी बात,कि सब किसी ना किसी काम में व्यस्त थी और मुझे सड़क पर लड़कों से ज्यादा लड़कियों की तादात लगी,मैंने भगवती भाई से पूछा कि यहाँ लड़कियों की कौम अधिक पढ़ी लिखी लगती है ।तब ड्राईवर ने बताया कि यहाँ महिलाओं का अनुपात पुरूषों के मुकाबले अधिक है,कोई भी महिला घर पर बैठना पसंद नहीं करती और कुछ नहीं तो "मोमो" (सिक्कीम का विशेष खाद्य पदार्थ ) ही बेचने लगती है ।मैने स्वंय की ही पीठ थपथपाई क्योंकि मेरे सारे अनुमान सही थे,ड्राईवर की नजरों में भी अपने लिये प्रशंसा के भाव देखे ।
रास्ते में "राॅक क्लाईम्बिंग" करते हुए हम लंच के लिये होटल पंहुच गये ।रास्ते में हम टोय ट्रेन के पास से गुजरे और शाम को इसकी सवारी करने का निश्चय कर लिया ।मैं घुम स्टेशन की नैसर्गिक सुंदरता को निहारने में मग्न थी,बच्चें भी खुश होकर अपने मोबाईल में छायाचित्र ले रहे थे,मैं अचम्भित थी ,उनके स्वभाव से वाकिफ थी,वे प्राकृतिक छटाओं को कभी नहीं निहारते । थोड़ी ही देर में मुझे उनकी खुशी का असली कारण पता चल गया,वास्तव में इस स्टेशन और ट्रेन को रणवीर कपूर की अभिनीत फिल्म बरफी में दर्शाया गया है बस यही उनके उत्साह की असली वजह थी । भगवती भाई ने हमे बताया कि ट्रेन की बूकिंग फुल है,सुशील मायूस से हो गये,वे बच्चों को इसकी सवारी कराना चाहते थे ।
दोपहर के खाने के बाद हमने थोड़ा आराम किया।शाम को कुछ साथी यात्रियों को लेकर हम माॅल रोड़ गये,बच्चों को शाॅपिंग में कोई दिलचस्पी नहीं थी इसलिये वे दोनो होटल में ही ठहर गये ।माॅल रोड़ एक चहल पहल वाला क्षेत्र था,पर्यटक यहाँ की शोभा बढ़ा रहे थे ।हल्की बारिश की फुहार थी , सूरज दिन भर की भागादौड़ के बाद निढ़ाल सा हुआ जा रहा था और चहलकदमी करते हम.......कुल मिलाकर यह एक खुशनुमा शाम थी । टोय ट्रेन में सफर ना कर पाने की मेरे पति की मायुसी भी अब दूर हो गई । मुझे वहाँ खरीदारी लायक कुछ नहीं मिला अतः हम होटल वापस आ गये ।
रात के खाने के समय निश्चित हुआ कि सुबह ३:३० को सब लोग सूर्योदय देखने टाईगर हिल जायेगे । इस बात पर आंटी भगवती भाई से उलझ पड़ी ।बिटीया की नासाज़ तबीयत के चलते मेरा नहीं जाना तय था,इसलिये मामले में ज्यादा ना उलझते हुए हम अपने कमरों में आ गये,बहुत थक चुके थे सो ज्योतिष को दुध लाने से मना कर दिया , बिस्तर पर गिरते ही हम नींद के आगोश में चले गये................

सोमवार, 27 मई 2013

HT NO TV DAY

आजकल कुछ खास दिनों को मनाने का प्रचलन बहुत जोरो पर हैं, जैसे hug day,rose day,kiss day,chocolate day,mothers day,fathers day,daughters day,smile day और भी ना जाने क्या क्या ।लेकिन इन सब के बीच "हिन्दुस्तान टाइम्स" एक नई पहल लेकर आया है और पिछले दो सालों से इस मुहिम को सफल भी बना रहा है । HT NO TV DAY एक सार्थक प्रयास ।
          पिछले दो सालों में HT ने ना केवल यह शुभ कार्य प्रारम्भ किया बल्कि इसे सफल बनाने के लिए भी भरसक प्रयत्न किये और निसन्देह: वह इसके लिये बधाई के पात्र है ।
           इस "बुद्धु बक्से" ने हमारी भावी पीढ़ी को पूरी तरह से अपने चक्रव्यूह में फंसा लिया है ।गृहिणीयों की रचनात्मकता और कुशलता भी इसको भेंट चढ़ गई । जो समय परिवार के नाम होता है,वो समय भी ये डकार गया । हमे सब पता है फिर भी........... ।
            मैं यहाँ TV के गुण और दोष नहीं गिनाने वाली हुँ ,वो तो हम सब को पता है ।मेरी इस post का पूरा श्रेय है HT की टीम को , जिनके जज्बे ने हम सबको प्रेरित किया tv बंद करने को ।मैं पिछले एक सप्ताह से पेपर में इनकी गतिविधियाँ देख रही हुँ और कही ना कही उनसे जुड़ी भी हूँ । इनके प्रयास अनुकरणीय है ,इस post के जरिये मैं भी यही संदेश देना चाहती हुँ कि हम सब को इस मुहिम में इनका साथ देना चाहिए । क्या हम अपने घर की बैठक में किसी बाहर वाले को एक दिन भी आने से नहीं रोक सकते ? 
            

पश्चिम बंगाल और सिक्कीम की मेरी यात्रा

.......बस के हिचकोलों के साथ अपनी सांसों के उतार-चढ़ाव को संयत करते हुए हम आखिरकार अपने होटल जगजीत तक पंहुच ही गये । ठंड हमे कपकपां रही थी,हम जल्दी से अपने अपने कमरों में जाना चाहते थे । बच्चों का कमरा हमारे कमरे से लगकर ही था । बच्चों को मौसम का विकराल  रूप बिल्कूल अच्छा नहीं लग रहा था । 
          थोड़ी ही देर में हम सब रात के खाने के लिए dining hall में गये जो कि ऊपर की मंजिल पर था,वहाँ हम सभी साथी यात्रियों का आपस में परिचय हुआ । मुझे पता चला कि साथ वाली दोनो आंटी आपस में समधन हैं और बड़ी वाली आंटी जो कि ७५ वर्ष की है ,रिटायर्ड डाॅक्टर हैं,दुसरी आंटी म्युजिक टीचर है । मेरे बच्चों को दोनो आंटीज् बड़ी मस्त (उनकी भाषा में) लगी ।खाना बहुत लजीज़ था।हमे दुसरे दिन के कार्यक्रम के बारे में बताया गया ।
२२अप्रेल -  
  1.                  सुबह का नाश्ता करने के बाद हम लोग माॅनेस्टरी देखने गये,जो कुछ ही कदमों की दूरी पर थी ।हमारे होटल से माॅनेस्टरी पास ही दिख रही थी ।हम आठ के समुह में थे और चढा़ई वाले रास्ते से चल पड़े । स्थानीय लोगो से रास्ता पूछते-पूछते हम बढ़ रहे थे,थोड़ी ही देर में हमारी सांस फूलने लगी और हम सब को अपने शारीरिक बल का अंदाजा स्वत: ही हो गया ।अब हमने छोटा रास्ता पकड़ा,जो सीढ़ियों वाला था । बेटी ने तुरंत कैमरा मुझे पकड़ा दिया और बोली कि "wow" कितना सुंदर रास्ता है । सच,यह एक संकरा सा ,पेड़ों से घिरा, खुबसूरत पथ था , यहाँ एक अलौकिक शांति  फैली थी जो मुझे निर्वाण पथ जैसा अहसास करा रही थी । मैने खुब छायाचित्र खीचें ।
       जब हम माॅनेस्टरी पंहुचे,हम थक चुके थे । लेकिन माॅनेस्टरी की खुबसूरती देख मेरी थकान फूर्र हो गई थी और पलक झपकते ही कैमरा मेरे हाथ में था । हम प्रांगण में गये,यह बहुत विशाल था....अंदर प्रार्थना हो रही थी,लग रहा था जैसे बहुत सारे लोग एक लय में ऊर्जा उत्पन्न कर रहे हो । हमने अंदर जाने की इजाजत मांगी,जो हमे मिल गई । अंदर का दृश्य अद्भुत था । सैकड़ों की संख्या में "लामा" कतारबद्ध थे और एक सुर में प्रार्थना कर रहे थे,हरेक के आगे एक किताब रखी थी । हमे देखकर भी , इनकी प्रार्थना में कोई विघ्न नहीं पड़ा और ना ही वे विचलीत हुए, हाँ नन्हे लामा, जो कि १२ से १६ वर्ष के बीच के होंगे, हल्की सी हँसी को अपने होठो पर ना लाने का भरसक प्रयत्न कर रहे थे और इसमे नाकाम भी हो रहे थे । मैने भी चुपके से एक मुस्कूराहट उनकी ओर फेंक दी, आखिर निर्वाण के पथ पर चल रहे इन बच्चों की चंचलता को तो ईश्वर भी नहीं झुठला सकते ।
       बौद्ध की विशाल प्रतिमा का दर्शन कर हम जल्दी बाहर आ गये ताकि हमारी वजह से वे बाधित ना हो । प्रांगण से चारो ओर का  दृश्य बहुत मनोरम था,हम सब फोटो खींच रहे थे,तभी सारे लामा बाहर आ गये,नन्हे लामा अब खुल के खिलखिला रहे थे, मैने उनके फोटोग्राफ्स लिए और हम वहाँ से निकल आये क्योकि अब हमे झील पर जाना था ।
            उतरते वक्त हमने सीढ़ियों वाले रास्ते को नजरअंदाज किया ।झील थोड़ी दूर थी लेकिन हम बतियाते हुए निकल आए ,रास्ते के सुंदर नजारों को अपने कैमरे और अपनी यादों में सहेजते हुए । राह में हमे एक नन्हा सा बच्चा दिखा , जिसे देखते ही बिटीया ने गोद में उठा लिया और फोटो खिचंवाने लगी....बच्चा वाकई बहुत प्यारा था ।
                 अब हम झील की तरफ थे ।झील के दोनो किनारों को एक पुल से जोड़ा गया था । यह स्थाप्त्य कला का बेजोड़ नमुना भी था । हमने पैदल चल कर झील का चक्कर लगाया जो कि घने पेड़ों से घिरी थी ।मैने पेड़ों के आस पास बहुत सारी फोटो खिंचवाई और उस वक्त ७० के दशक की फिल्में जैसे मुझसे रूबरु हो रही थी ।
                      दोपहर के खाने का समय हो रहा था और हमे दार्जिलींग के लिए भी निकलना था इसलिए हम वापस होटल आ गए । खाना खाने के बाद हम " इनोवा" गाड़ी से रवाना हो गए ।रास्ते में हमे "नेपाल बोर्डर" पर रुकना था । 
                        दो घंटे बाद हम बोर्डर पर पहंुच गये, स्थानिय टैक्सी से हम नेपाल गये,जहाँ से हमे "शाॅपिंग" करनी थी ।रौनक बहुत खूश था,उसने फटाफट मोबाईल में नेपाल का लोकेशन डाला (जैसा कि आजकल की पीढ़ी करती है..... Status update ) ।हमने वहाँ से जूतें और कपड़ें खरीदे , मौसम के मिजाज को समझते हुए हम टैक्सी की ओर दौड़ पड़े,रास्ते में आंटी को दुकान वाले से उलझते हुए देखा ।
              हम गाड़ी में बैठ गये,ट्यूर मैनेजर हमारी गाड़ी में ही था,मौसम खराब हो चला था , मैनेजर आंटी पर चिल्ला रहा था । उसकी चिंता जायज थी,उम्र के इस पड़ाव पर सतर्क रहना सही रहता है । 
  •      रात के खाने के समय तक हम दार्जिलींग के पास " घुम" नामक जगह पर अपने होटल में पहंुच चुके थे । मौसम खराब था और बच्चों को फिर से अच्छा नहीं लग रहा था ।रात को हम सबने कुछ मजेदार खेल खेले,जिसमे मैं जीती ।अब बच्चों ने खुब मजा़ लिया ।ट्यूर मैनेजर रौनक के साथ बहुत घुलमिल गया था। एक बार फिर,खाना बहुत लजीज़ था ।रात को "ज्योतिष" (ट्यूर मैनेजर का सहयोगी) मसाला दुध लेकर आया ,दार्जिलींग की ठंड में मुझे इसकी जरुरत भी थी ।

शनिवार, 25 मई 2013

पश्चिम बंगाल और सिक्कीम की मेरी यात्रा


मैं बहुत उत्साहित थी,अपनी इस यात्रा को लेकर । पूरे दो सालों के बाद , फुर्सत के कुछ पल जूटा पाई थी मैं । हालांकि लेह की यादें अभी भी मेरे जेहन में ताजा थी,लेकिन एक नया पड़ाव मुझे अपनी ओर खींच रहा था ।
       २१अप्रेल की हमारी "बुकिंग" लगभग तीन महीनों पहले हो चुकी थी। हमारी तैयारियाँ भी काफी समय पहले शुरु हो चुकी थी.....और फिर मुम्बई की चिपचिपाहट वाली गरमी भी जैसे हमे किसी पर्वतीय स्थल पर धकेल रही थी......।

२१अप्रेल :- हमारा "ट्यूर" बागडोगरा से प्रारम्भ हुआ। मुम्बई से बागडोगरा की हमारी यात्रा दो चरणों में पूरी हुई.....। सुबह करीब साढ़े तीन बजे हम घर से निकले.... हवाईअड्डे की औपचारिकताओं को निपटा कर छः बजे हमने उड़ान भरी,आठ बजे तक हम दिल्ली पहुंचे और दुसरी हवाईयात्रा का इंतजार करने लगे,जो कि ११ बजे की थी । दिल्ली हवाईअड्डे की खुबसूरती निहारने में कब ११ बज गये पता ही नहीं चला ।अब हम हमारे गंत्व्य स्थल की यात्रा की ओर अग्रसर थे.....और १२:३० पर हम बागडोगरा हवाईअड्डे पर खड़े थे ।
       हमारा "ट्यूर मैनेजर" हमारे स्वागत के लिए पहले से ही वहाँ मौजूद था ..... एक मिनी बस हमारे इंतजार में थी । हम गरमी से व्याकुल हो रहे थे,दूसरे साथी यात्री अभी आने बाकी थे.....।दो सहयात्री आ चुके थे....दोपहर के खाने का समय हो चुका था.... पेट में धमा-चौकड़ी मचा रहे चुहों की फौज ने हमे जल्दी ही खाने के पास पहुंचा दिया । हमारे खाना खाने के दौरान ही बाकी सहयात्री भी आ चुके थे । ५-६ बजे के करीब हमने मिरिक की ओर प्रस्थान किया ।हम ३५ के समूह में थे और दो बसों में थे ।
                  यात्रा के चलते ही गरमी हाथ छुड़ा के भाग गई और मंद बयार मेरे बालों के साथ खेलने लगी । हम दोनो पास पास बैठे थे , और लड़ाई झगड़े के चलते दोनो बच्चें मुँह फुलाकर अलग अलग कोनों में बैठ गये । 
                            जैसे जैसे हम ऊपर की ओर चढ़ते गये,मौसम खराब होने लगा ।मेरे पास वाली सीट पर दो आंटी बैठी थी, ६०-७० की उम्र की इन महिलाओं का जज्बा़ देखकर मैं स्तब्ध थी,और पूरे "ट्यूर"के दौरान कई बार मैने उनके जज्बें को सलाम किया ।
               ट्यूर मैनेजर से मिरिक के बारे में जानकारी लेते हम आगे बढ़ रहे थे ।यह पश्चिम बंगाल के दार्जीलिंग जिले की एक छोटी सी सैरगाह है,जो समूद्रतल से ५८०० फीट की ऊँचाई पर स्थित है ।बातों-बातों में पता ही नही चला कि बाहर अंधेरा घिर आया है और मौसम अलमस्त हो पूरा बिगड़ने के अंदाज में था । घना कोहरा,घूप्प अंधेरा,पतली सी सड़क जिसे पगडंडी ही कहे तो ज्यादा उचित होगा,टेढ़े-मेढ़े रस्ते और झमाझम बरसात..... कूल मिलाकर हाॅरर फिल्म के बैकग्राउंड सीन जैसा दृश्य था..... मैने बच्चों को संभाला जो अकेले बैठे थे....शगुन एकदम आगे बैठी थी,उसके पापा उसके पास बैठ गये और मैं रौनक के पास ।
         धीरे-धीरे सब चूप हो गये ।एक सन्नाटा सा पसर गया बस में,जिसे बिजली की तेज गड़गड़ाहट बीच बीच में तोड़ देती थी ।घने कोहरे में हमे कुछ नहीं दिख रहा था लेकिन फिर भी हमारा ड्राईवर बड़े ही आत्मविश्वास से बस चला रहा था,वो भी फोन पर बतियाते हुए...बड़ी कोफ्त हुई थी इन मोबाईल फोन बनाने वालों पर ।बारिश तेज हो चली थी...... बल्कि भयकंर बरसात में तब्दील हो चुकी थी......कि तभी एक चमकती हुई विद्यूत रेखा पूरे अट्टाहस के साथ बस के एकदम पास से नीचे चली गई...... हम सब सकते में आ गये ,अब तो हर दूसरे तीसरे मोड़  पर ये विद्यूत रेखा हमसे मिलने आती रही,उस रेखा की रोशनी में मैने आस पास वालों के चेहरे देखे,जो कुछ डरे हुए प्रतीत हुए ।ड्राईवर अब भी फोन पर बात कर रहा था..... इसलिए हम सब और भी सतर्क थे,बस का वाईफर भी काम नहीं कर रहा था.......और उस पर घना कोहरा ।सब जैसे बुत बन गये थे,खिड़की के बाहर देखो तो कलेजा मुहँ को आता था.......वैसे भी सबकी नजर ड्राईवर पर ही लगी थी,.और जब कभी सामने से दूसरा वाहन आ जाता था तो मुझे हमारा ड्राईवर हनुमान सा लगने लगता ।देवों के देव,सबके रक्षक हनुमान स्वतः ही मेरे मन पर हावी हुए जा रहे थे,और शायद सभी के मनों पर ।
                                                 मुझे अपनी यह यात्रा बिगड़ते मौसम के आगे बली चढ़ती सी लगने लगी ।बस प्रभु स्मरण के साथ सकुशल होटल पहुंचने की इच्छा ही अधिक बलवती थी । रौनक ने मुझसे पूछा कि हम ऐसी जगहो पर ही घूमने क्यो आते है, गुजरात,राजस्थान और केरल क्यों नही जाते ? ....और मैं बस मुस्कूरा दी.....

सोमवार, 4 मार्च 2013

सूरज और मैं

पूरे दिन का थका-मांदा ढलता सा सूरज
कल रात;
मेरे आंगन के एक कोने में आ छुपा
रात के साये से घबराया
सिमट रहा था मेरे ही आँचल में
मैंने कहा,चलो बतियाए थोड़ा
देख के स्नेह मेरा
उसने भी मौन तोड़ा
उसे सहमा सा देखा तो खुद पे हुआ गुमां
और कह बैठी सूरज से
कि तुझमे हैं ज्वाला इतनी
तो लौ मुझमे भी कम नहीं
तेरे जितना तेज ना सही
लेकिन;
मैं भी किसी से कम नहीं
जिस सृष्टी को देते हो तुम उजाला
सोचो जरा
कौन है उसे जन्म देने वाला
तुम तो रात के सायों में खो जाते हो
सितारों के आगोश में सो जाते हो
लेकिन मैं........
खुद ही सितारों की चूनर बन जाती हूँ
और तुम जैसों को अपने आँचल मे सहलाती हूँ
मेरी बातें सुन,सूरज मुस्कुराया
और बोला हँस कर
तु तो है वो नन्हा सा दिया
जिसकी लौ पे सबने अभिमान किया
मेरी ज्वाला किसी से सही ना जाए
लेकिन तेरी लौ सबको पास बुलाए
तुने पूछा........क्या हूँ मैं ?
मैं तो बस तेरे माथे पे सजा सिंगार हूँ.........
ऐसा कह चला गया वो नन्हा सा सहमा सा सूरज
आसमां को सिंदूरी करने
अपनी किरणों को मेरे आँगन मे छोड़..........
Proud to be a woman