गुरुवार, 5 जुलाई 2012

कोरा कागज

कुछ खास नहीं
आज लिखने को 
तो सोचा 
चलो समय के कागज पर 
कलम को अपनेआप ही चलने दूं 
अपनी ही लेखनी को एक नया आयाम दूँ 
दिल और दिमाग  पर छाये शब्दों को 
अस्त-व्यस्त ही सही 
लेकिन बहने दूं 
शायद कविता ना बन पाए 
शायद अक्षर मोती से ना  सज पाए 
लेकिन 
चलने दूं 
लेखनी को 
अपनी ही रफ़्तार में 
लिखने दूं 
कुछ शब्द अपनी ही जिंदगी की किताब के 
लेकिन ये क्या ?
कुछ कडवे पर सच्चे शब्द 
उड़ गए वक़्त की आंधी में , किसी पाबंदी में 
निकले थे जो दिमाग  के रस्ते से 
और कुछ भावुक शब्द 
पिघल गए अपनी ही गरमी से 
धुल गए आंसुओं से 
जो निकले थे सीधे दिल से 
और................................
मेरी लेखनी को आयाम नहीं 
सिर्फ विराम मिला 
और मेरा कागज जो कोरा था 
कोरा ही रह गया